#MahanayakDharma : भगवान शांतिनाथ का आज जन्म दिन , तप एव मोक्ष कल्याणक  दिन सोहळा

Advertisements
Advertisements
Spread the love

राजाबाजार जैन मंदिर में विराजित 16 वे तीर्थंकर अशिष्टता शांतिनाथ भगवान

Advertisements

खंडेलवाल दिगम्बर जैन पंचायत राजाबाजार में विराजित देवाधिदेव 16 वे तीर्थंकर, 5 वे चक्रवर्ती और 12 वे कामदेव ऐसे  तीन पद के धारी देवाधिदेव शांतिनाथ का गुरुवार, ज्येष्ठ कृष्णा चतुर्दशी, वी. सं.2546,दि.21 मई  2020  को जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक दिन है ।इस उपलक्ष्य में  राजाबाजार जैन मंदिर की औरसे भगवान शांतिनाथ का अत्यंत अल्प उपस्थिति एव सभी सरकार द्वारा निर्देशित नियमो के तहत सिर्फ पंचयात के पुजारी के हाथोंसे भगवान पंचामृत अभिषेक किया गया साथ ही साथ पंचयात  के अध्यक्ष ललित पाटनी एव सचिव अशोक अजमेरा एव कार्यकारणी सदश्य प्रमोद पांडे इनके सहयोग से सामाजिक उत्तरदायित्व निभाते हुए लॉयन्स क्लब ऑफ औरंगाबाद मिडटाउन डायलीसिस सेन्टर की औरसे  आज गुरुवार को होने वाले सभी डायलिसिस पेशेंट का डायलिसिस निःशुल्क संपन्न करने का निर्णय लॉयन्स मिडटाउन मेडिकल ट्रस्ट के अध्यक्ष एव राजाबाजार पंचायत के विश्वस्त महावीर पाटनी ने लिया इस प्रसंग पर अंतराष्ट्रीय संचालक डॉ नवल मालू एव डॉ गीता मालू ,एवं लायंस मिड़टाउन के अध्यक्ष कुलभूषण जैन एव सदश्य की उपस्थिति प्राप्त होनेवाली है,यह निःशुल्क शिंबिर सुबह 9 बजे प्रारम्भ होगा ऐसी जानकारी ट्रस्ट के पी आर ओ डॉ सतीश सुराणा ने दी है।

Advertisements
Advertisements

जैन तीर्थंकर शांतिनाथ भगवान का संशिप्त परिचय जैन पुराणों की मान्यता ओ से।

शांतिनाथ भगवान के पहले जो 15 तीर्थंकरों ने मोक्षमार्ग चलाया था,वह बीच बीच में विनष्ट होता जाता था।

16 वे तीर्थंकर इस युग के आद्यगुरु श्री शांतिनाथ भगवान ने जो मोक्षमार्ग प्रगट किया वही आजतक अखंड ,बाधारहित चला आ रहा है। आज भी भव्य जीव शांति प्राप्तिके लिये श्री शांतिनाथ की आराधना ,निरंतर ध्यान करते हैं।

श्री शांतिनाथ भगवान के 12 भव

1.शांतिनाथ भगवान तीर्थंकर होने से बारहवे भव पूर्व राजा श्रीषेण थे।

2.मुनि को आहार देने के प्रभाव से  श्रीषेण राजा मृत्यु के बाद धातकीखंड पूर्वार्ध भाग के उत्तर कुरु प्रदेश भोगभूमि में गये थे।

3.फिर सौधर्म स्वर्ग के श्रीप्रभ विमान में वे श्रीप्रभ देव हुये।

4.फिर वे अमिततेज नाम से विद्याधर हुए।

5.फिर तेरहवे  स्वर्ग के नंद्यावर्त विमान में वे रविचुल नाम के देव हुए।

6.फिर जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में वत्सकावती देश की प्रभाकरी नगरी में  वे अपराजित नाम के बलभद्र हुए।

7.फिर वे अच्युत स्वर्ग में इंद्रदेव हुए।

8.फिर वे जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र के रत्नसंचय नगर में वज्रायुध चक्रवर्ती हुए। वज्रायुध चक्रवर्ती के भव में दीक्षा ली, एक वर्ष का योग धारण कर जब खड़े थे तब इनके शरीर पर लताएँ चढ़ गई, सर्पों ने वामी बना ली,पक्षियों ने घोसले बना लिए और वज्रायुध मुनिराज ध्यान में लीन थे।

9.अनन्तर वे उर्ध्व ग्रैवेयक के नीचे के सौमनस विमान में अहमिन्द्र हुए।

10.फिर उन्होंने जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में मेघरथ राजा होकर दीक्षा ली, घोर तपश्चरण करते हुए सोलह कारण भावनाओं का चिन्तवन किया  और उसके प्रभाव से तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया।

11..फिर वहाँ से सर्वार्थसिध्दि में अहमिन्द्र हुए।

12.सर्वार्थसिध्दि से आकर सोलहवे तीर्थंकर और पंचम चक्रवर्ती ऐसे शांतिनाथ भगवान हुए।

श्री शांतिनाथ भगवान का परिचय:

जैन धर्म के सोलहवें तीर्थंकर शांतिनाथ का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रातः काल  शुभ भरणी नक्षत्रों के योग में हुआ था। उनके पिता का नाम विश्वसेन था, जो हस्तिनापुर के राजा थे। उनकी माता का नाम महारानी ऐरादेवी  था।

बचपन में ही शिशु शांतिनाथ कामदेव के समान सुंदर थे। कहा जाता है उनका मनोहारी रूप देखने के लिए देवराज इन्द्र-इन्द्राणी सहित उपस्थित हुए थे। शांतिनाथ के शरीर की आभा स्वर्ण के समान दिखाई देती थी। उनके शरीर पर सूर्य, चन्द्र, ध्वजा, शंख, चक्र और तोरण के शुभ मंगल चिह्न अंकित थे। जन्म से ही उनकी जिह्वा पर मां सरस्वती देवी विराजमान थीं।

जब शांतिनाथ युवावस्‍था में पहुंचे तो राजा विश्वसेन ने उनका विवाह कराया एवं  राजा विश्वसेन ने मुनि-दीक्षा ले ली। राजा बने शांतिनाथ के शरीर पर जन्म से ही शुभ चिह्न थे।उनके प्रताप से वे शीघ्र ही चक्रवर्ती राजा बन गए।उनकी 96 हजार रानियां थीं। उनके पास 18 करोड़ घोड़े,84 लाख हाथी, 360 रसोइए, 84 करोड़ सैनिक, 28 हजार वन,18 हजार मंडलिक राज्य, 360 राजवैद्य, 32 हजार अंगरक्षक देव, 32 चमर ढोलने वाले यक्ष, 32 हजार मुकुटबध्द राजा, तीन करोड़ उत्तम वीर,अनेकों करोड़ विद्याधर,88000 म्लेच्छ राजा, 96 करोड़ ग्राम, 1 करोड़ हंडे, 3 करोड़ गायें, 3 करोड़ 50 लाख बंधु-बांधव, 10 प्रकार के दिव्य भोग, 9 निधियां और 14 रत्न, 3 करोड़ थालियां आदि  संपदा थीं। उनके 75 हजार नगर,16000 खेट, 24000 कर्वट, 4000 मटम्ब, 48000 पत्तन आदि अनेकों वैभव थे।

इस अकूत संपदा के मालिक रहे राजा शांतिनाथ ने सैकड़ों वर्षों तक पूरी पृथ्वी पर न्यायपूर्वक शासन किया। तभी एक दिन  वे दर्पण में अपना मुख देख रहे थे तभी उनकी किशोरावस्था का एक और मुख दर्पण में दिखाई पड़ने लगा, मानो वह उन्हें कुछ संकेत कर रहा था।

उस संकेत देख वे समझ गए कि वे पहले किशोर थे फिर युवा हुए और अब प्रौढ़। इसी प्रकार सारा जीवन बीत जाएगा। लेकिन उन्हें इस जीवन-मरण के चक्र से छुटकारा पाना है। यही उनके जीवन का उद्देश्य भी है। …और उसी पल उन्होंनेअपने पुत्र नारायण का राज्याभिषेक किया और

ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को भरणी नक्षत्र में बेला का नियम लेकर स्वयं दीक्षा लेकर दिगंबर मुनि का वेष धारण कर लिया। मुनि बनने के बाद लगातार सोलह वर्षों तक विभिन्न वनों में रहकर घोर तप करने के पश्चात अंतत: पौष शुक्ल दशमी को उन्हें केवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई और वे तीर्थंकर कहलाएं।

तदंतर उन्होंने घूम-घूमकर लोक-कल्याण किया, उपदेश दिए। ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सम्मेद शिखर जी पर भगवान शांतिनाथ को निर्वाण प्राप्त हुआ। जैन धर्म के पुराणों के अनुसार उनकी आयु एक लाख वर्ष कही गई हैं।

जन्म लिया प्रभु आप ज्येष्ठ वदी चौदस में।

सुरगिरि पर अभिषेक किया सभी सुरपति ने।।

शांतिनाथ यह नाम रखा शान्तिकर जग में।

हम नावे निज माथ जिनवर चरणकमल में।।

ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां श्री शांतिनाथजिनजन्म- कल्याणकाय नमः अर्घ्यं……………

दीक्षा ली प्रभु आप ज्येष्ठ वदी चौदस के।

लौकांतिक सुर आय बहु स्तवन उचरते।।

इंद्र सपरिकर आय तप कल्याणक करते।

हम पूजें नत माथ सब दुख संकट हरते।।

ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां श्रीशांतिनाथजिनदीक्षा-

कल्याणकाय नमः अर्घ्यं

प्राप्त किया निर्वाण ज्येष्ठ वदी चौदस में।

आत्यंतिक सुखशांति प्राप्त किया उस क्षण में।।

महामहोत्सव इंद्र करते बहुवैभव से।

हम पूजें जिनपाद छूटें सभी भवदुःख से।।

ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णाचतुर्दश्यां श्रीशांतिनाथजिनमोक्ष-

कल्याणकाय नमः अर्घ्यं…….

अनमोल रत्नत्रय निधीकी मैं करूँ अब याचना।

जिन अर्घ्य लेकर पूजते ही पूर्ण होगी कामना।।

श्री शांतिनाथ जिनेश शाश्वत शांति के दाता तुम्हीं।

प्रभु शांति ऐसी दीजिये हो फिर कभी यांचा नहीं।।

ॐ ह्रीं श्रीशांतिनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये नमः अर्घ्यं

आपलं सरकार